उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ek aankh ko zauq-e-jamal de ya-rab

हर एक आँख को ज़ौक़-ए-जमाल दे या-रब

ہر ایک آنکھ کو ذوق جمال دے یا رب

शायर: Vafa Malikpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर एक आँख को ज़ौक़-ए-जमाल दे या-रब
दिलों को इश्क़-ओ-वफ़ा का जलाल दे या-रब

है मेरे ज़ेहन-ए-रसा में जो इक तसव्वुर-ए-हक़
मिरा क़लम उसी साँचे में ढाल दे या-रब

ज़बाँ से बात जो निकले हमेशा हक़ निकले
लिसान-ए-सिद्क़ को हुस्न-ए-मक़ाल दे या-रब

इस अह्द-ए-ज़ोर में इस का सँभलना मुश्किल है
तू ही शरीफ़ों की पगड़ी सँभाल दे या-रब

खटक रहा है दिलों में मिरे हरीफ़ों के
बहुत दिनों से जो काँटा निकाल दे या-रब

नफ़स में गर्मी-ए-ईमान-ए-बूज़र-ओ-सलमाँ
दिलों में सोज़-ए-उवेस-ओ-बिलाल दे या-रब

जो ख़्वाहिशों में घिरा हो वो तुझ से क्या माँगे
तुझे जो देना है वो बे-सवाल दे या-रब