उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi chaman se kabhi anjuman se guzre hain

कभी चमन से कभी अंजुमन से गुज़रे हैं

کبھی چمن سے کبھی انجمن سے گزرے ہیں

शायर: Vafa Malikpuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी चमन से कभी अंजुमन से गुज़रे हैं
पड़ा है वक़्त तो दार-ओ-रसन से गुज़रे हैं

वो क्या डरेंगे तिरे पेच-ओ-ख़म से राह-ए-हयात
जो कू-ए-ज़ुल्फ़-ए-शिकन-दर-शिकन से गुज़रे हैं

निसार मौसम-ए-गुल उन की ख़ंदा-रूई पर
जो मुस्कुराते हुए इस चमन से गुज़रे हैं

उन्हीं के वास्ते ज़ेबा है नाज़-ए-कज-कुलही
रह-ए-हयात में जो बाँकपन से गुज़रे हैं

रची-बसी है यहाँ उन के पैरहन की महक
अभी अभी वो इसी अंजुमन से गुज़रे हैं

नज़र नज़र में जला कर चराग़-ए-दानिश-ओ-दीं
हमीं सवाद-ए-दिल-ए-अहरमन से गुज़रे हैं

हमीं लबों पे दु’आओं का क़ाफ़िला ले कर
सहाब-ए-बारगह-ए-ज़ुल-मिनन से गुज़रे हैं

हमीं छिड़कते हुए जा-ब-जा लहू अपना
दयार-ए-लाला-ओ-सर्व-ओ-समन से गुज़रे हैं