उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tamam raat musalsal ayagh chalta raha

तमाम रात मुसलसल अयाग़ चलता रहा

تمام رات مسلسل ایاغ چلتا رہا

शायर: Parveen Shaghaf6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तमाम रात मुसलसल अयाग़ चलता रहा
दरून-ए-क़ल्ब मुसलसल चराग़ जलता रहा

अजब कहानियाँ बनती हैं निस्फ़ रातों में
शबाब-ए-नौ से मुसलसल शरार उबलता रहा

मिटाती तीरगी-ए-शब क्या चाँदनी आख़िर
ग़म-ए-दग़ा में मुसलसल जो चाँद ढलता रहा

ये उन का दावा मसीहाई का है मक्र-ओ-फ़रेब
लिपट के उन से मुसलसल कोई मचलता रहा

हमेशा अश्कों की ज़द में ही रात ढलती रही
उमीद-ए-जाँ में मुसलसल जिगर पिघलता रहा

ये हम से पूछो तो क्या है ये शय भी लुत्फ़ 'शग़फ़'
कि दर्द-ए-अश्क मुसलसल क़बा बदलता रहा