उर्दू शायरी · ग़ज़ल

taDapta main rahun furqat mein teri dil-nashin kab tak

तड़पता मैं रहूँ फ़ुर्क़त में तेरी दिल-नशीं कब तक

تڑپتا میں رہوں فرقت میں تیری دل نشیں کب تک

शायर: Dard Faiz Khan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तड़पता मैं रहूँ फ़ुर्क़त में तेरी दिल-नशीं कब तक
मिरी आँखें न देखेंगी तिरा चेहरा हसीं कब तक

ये दिल और जान भी क़ुर्बान तुझ पर कर दिया मैं ने
रहेगी तेरे बिन सूनी मिरे दिल की ज़मीं कब तक

चला आ अब न मुझ को ऐसे तड़पा ऐ मिरे हमदम
गुज़ारूँ ज़िंदगी तन्हा तिरे बिन अब यहीं कब तक

सभी उलझे पड़े हैं ख़ुद ही अपने सब सवालों में
जहाँ के ऐब ही देखा करेंगे नुक्ता-चीं कब तक

लगाए आस बैठा है तू कब से राह में उस की
बता दे आएगी वो 'फ़ैज़' तेरी मह-जबीं कब तक