उर्दू शायरी · ग़ज़ल

taDap mein bhi maza aane laga hai gham ke maron ko

तड़प में भी मज़ा आने लगा है ग़म के मारों को

تڑپ میں بھی مزہ آنے لگا ہے غم کے ماروں کو

शायर: Sabir Abuhari8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तड़प में भी मज़ा आने लगा है ग़म के मारों को
ख़याल-ए-सरख़ुशी बहका न दे इन सोगवारों को

गुलिस्ताँ जो बनाना चाहते थे ख़ारज़ारों को
उन्हीं की शोख़-गामी रौंदती है लाला-ज़ारों को

सआ'दत चाहता था कल फ़लक भी जिन के सज्दों की
बगूले ढूँडते फिरते हैं आज उन के ग़ुबारों को

मय-ओ-कौसर की ख़ातिर जब ये ख़ुद सज्दों में गिरता है
तो किस मुँह से बुरा कहता है ज़ाहिद मय-गुसारों को

रुमूज़-ए-इश्क़ से कोई उसे आगाह कर देता
जला कर हँस रही है शम्अ' अपने जाँ-निसारों को

अता कर दी मिरे हुस्न-ए-नज़र ने शान-ए-यकताई
जहाँ में कौन वर्ना पूछता था गुल-'इज़ारों को

न देखे जा सके जो तूर पर मुश्ताक़ नज़रों से
ब-चश्म-ए-शौक़ हम ने ख़ूब देखा उन नज़ारों को

अज़ल से जो फ़ना का ख़ौफ़ ले कर सहमे बैठे हैं
तलातुम-आश्ना करता है 'साबिर' उन किनारों को