उर्दू शायरी · ग़ज़ल

taDap aisi ki bas din-raat aahen bharte jate hain

तड़प ऐसी कि बस दिन-रात आहें भरते जाते हैं

تڑپ ایسی کہ بس دن رات آہیں بھرتے جاتے ہیں

शायर: Yasir Rampuri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तड़प ऐसी कि बस दिन-रात आहें भरते जाते हैं
तुम्हारे 'इश्क़ में बे-मौत 'आशिक़ मरते जाते हैं

उधर वो बुत बने बैठे हुए तकते हैं सूरत को
इधर रो-रो के ‘अर्ज़-ए-मुद्दआ हम करते जाते हैं

लगाता है गले से अपनी महफ़िल में वो ग़ैरों को
बस इक हम से ही आदाब-ए-तकल्लुफ़ बरते जाते हैं

ये दिल भी हौले-हौले ग़म का ‘आदी होता जाता है
जिगर के ज़ख़्म सारे रफ़्ता-रफ़्ता भरते जाते हैं

ग़ज़ल कैसी कहाँ का फ़न कहाँ की शा'इरी 'यासिर'
गुज़रती है जो कुछ दिल पर रक़म हम करते जाते हैं