उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sukut-e-lab ko mere arz-e-haal hi samjho

सुकूत-ए-लब को मिरे अर्ज़-ए-हाल ही समझो

سکوت لب کو مرے عرض حال ہی سمجھو

शायर: Lais Quraishi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुकूत-ए-लब को मिरे अर्ज़-ए-हाल ही समझो
मिरी अना-ए-ख़फ़ी को सवाल ही समझो

वो रू-ब-रू हैं मिरे दिल मगर ये कहता है
ख़याल-ए-हुस्न को हुस्न-ए-ख़याल ही समझो

रफ़ाक़तों के क़रीने बदलते रहते हैं
सो कर्ब-ए-हिज्र को लुत्फ़-ए-विसाल ही समझो

तड़प रहे हैं जो यूँ हम सदा-ए-साज़ के साथ
उसे कुछ और नहीं वज्द-ओ-हाल ही समझो

मिरे हुनर को रहा बज़्म-ए-कम-नज़र से गुरेज़
उसे भी मेरे हुनर का कमाल ही समझो

हवा-ए-सुब्ह-ए-चमन और एक बार अगर
गुज़र गई तो हमें पाएमाल ही समझो

दिलों के ज़ख़्म छुपे हैं लहू की चादर में
तुम्हें ग़रज़ नहीं तुम इंदिमाल ही समझो

हुसूल-ए-कैफ़ को मय-ख़ाना-ए-हयात में 'लैस'
शिकस्त-ए-जाम से पहले मुहाल ही समझो