उर्दू शायरी · ग़ज़ल

subh ko sham karta rahta hun

सुब्ह को शाम करता रहता हूँ

صبح کو شام کرتا رہتا ہوں

शायर: Kalim Akhtar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुब्ह को शाम करता रहता हूँ
मुश्किलों से गुज़रता रहता हूँ

कुछ न कुछ काम करता रहता हूँ
ख़ुद पे इल्ज़ाम धरता रहता हूँ

ख़ुश्क पत्तों की तरह सुब्ह-ओ-शाम
लम्हा-लम्हा बिखरता रहता हूँ

क़द्र की सरज़मीन बंजर है
मैं भी शादाब करता रहता हूँ

ज़ख़्म-ए-दिल का इलाज मुमकिन हो
नमक-ए-ग़म से भरता रहता हूँ

लम्हे-लम्हे का ले ले मुझ से हिसाब
जीता रहता हूँ मरता रहता हूँ

शायद उस का सुराग़ मिल जाए
अपने अंदर उतरता रहता हूँ