उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sona na aashiqon ko kabhi hashr tak mile

सोना न 'आशिक़ों को कभी हश्र तक मिले

سونا نہ عاشقوں کو کبھی حشر تک ملے

शायर: Ufuq Lakhnavi13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सोना न 'आशिक़ों को कभी हश्र तक मिले
बंद आँख हो मगर न पलक से पलक मिले

ज़ख़्मों को मेरे दर्द का भाता नहीं मज़ा
छिड़कूँ जो अबरुओं के तले का नमक मिले

घेरे है मेरे क़िल'अ-ए-दिल को हुजूम-ए-यास
ऐ शाह-ए-हुस्न फ़ौज-ए-मिज़ा की कुमक मिले

तारीख़-ए-नज्म-ओ-शम्स-ओ-क़मर मुझ से कर बयाँ
ये दाग़ किस के ग़म में तुझे ऐ फ़लक मिले

रहने की चश्म-ओ-दिल में न उस को मिले जगह
वाँ आरज़ू में पलकें यहाँ मर्दुमक मिले

बोसा मिले तो सोहबत-ए-उल्फ़त में हो मज़ा
लुत्फ़-ए-शराब-ए-वस्ल मिले गर गज़क मिले

क्या कीजिए शिकायत-ए-अहबाब-ए-दिल-शिकन
शानों के तोड़ने को अज़ल से मलक मिले

मर्दुम की तरह सैर करो चश्म-ए-ज़ार में
है ख़ुश-नसीब जिस को ये ठंडी सड़क मिले

पहचानने न पाए तिरी शक्ल क्या कहें
आँखें खुली न थीं हमें जब मर्दुमक मिले

क़िस्मत में था कलंक का टीका लिखा हुआ
इस वास्ते बुतों की जबीं को तिलक मिले

ख़ूब आज़माइश-ए-ज़र-ए-तक़दीर हम करें
गर आस्तान-ए-संग-ए-सनम की महक मिले

आँखें वो 'आशिक़ों से लड़ाएँ तो हों ख़जिल
फ़ौज-ए-मिज़ा को एक इशारे में ज़क मिले

उल्फ़त जिसे हो ख़ाल-ए-लब-ए-यार से 'उफ़ुक़'
सरकार-ए-‘इश्क़ से उसे नान-ओ-नमक मिले