उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dam mein phir jae jo wo chashm-e-inayat kaisi

दम में फिर जाए जो वो चश्म-ए-'इनायत कैसी

دم میں پھر جائے جو وہ چشم عنایت کیسی

शायर: Ufuq Lakhnavi12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दम में फिर जाए जो वो चश्म-ए-'इनायत कैसी
एक नुक़्ते से जो ज़हमत हो वो रहमत कैसी

जुर्म-बख़्शी की तमन्नाएँ 'इबादत कैसी
मुंसिफ़ अल्लाह है उस के लिए रिश्वत कैसी

साथ मेरा जो हुआ हूर पे मरने लगे शैख़
जल्द इंसाँ पे असर करती है सोहबत कैसी

दिल पे क़ाबू नहीं कुछ चाहे ये जिस पे आ जाए
चाँद सा कैसा बदन साँवली सूरत कैसी

दौड़-धूप आँखों में करते हैं बुतान-ए-कमसिन
खेल की होती है अतफ़ाल को 'आदत कैसी

जान बोसे के 'एवज़ लेने में क्यों है तकरार
दिल में सोचो तो कि हाज़िर में ये हुज्जत कैसी

अहल-ए-दुनिया हमें आते हैं नज़र ज़ाहिर में
चाहिए शक्ल उन्हें अच्छी हो सीरत कैसी

कमर-ए-यार के गुम होने का हर-सू ग़ुल है
देखो बेनाम-ओ-निशाँ की हुई शोहरत कैसी

बोसा ले कर तिरा एहसान कोई क्या माने
अपने मतलब के लिए की तू सख़ावत कैसी

'उम्र क्यों ज़ुहद में ऐ शैख़ गंवाएँ 'उश्शाक़
हूर दुनिया में जो मिल जाए तो जन्नत कैसी

यार ने गर मुझे ऐ मर्ग नहीं याद किया
आई है फिर मुझे हिचकी दम-ए-रेहलत कैसी

यही कहता है जो अश'आर-ए-'उफ़ुक़' सुनता है
पाई है उस ने ख़ुदा जाने तबी'अत कैसी