उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kal dil hi dil mein wasl ki shab baat rah gai

कल दिल ही दिल में वस्ल की शब बात रह गई

کل دل ہی دل میں وصل کی شب بات رہ گئی

शायर: Ufuq Lakhnavi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कल दिल ही दिल में वस्ल की शब बात रह गई
वो चल दिए जब एक पहर रात रह गई

रहती हैं बादलों के 'एवज़ आँखें अश्क-बार
दुनिया में एक बस यही बरसात रह गई

कफ़नी बदन पे है तो बिछाने को बोरिया
ज़ुहहाद की जहाँ में ये औक़ात रह गई

दुश्मन मिले रक़ीब मिले मोहतसिब मिले
महफ़िल में सिर्फ़ उन से मुलाक़ात रह गई

वामिक़ नहीं है क़ैस नहीं कोहकन नहीं
'उश्शाक़ में तिरी ही 'उफ़ुक़' ज़ात रह गई