उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamare zaKHm mein ThanDak lahu se hoti rahti hai

हमारे ज़ख़्म में ठंडक लहू से होती रहती है

ہمارے زخم میں ٹھنڈک لہو سے ہوتی رہتی ہے

शायर: Ufuq Lakhnavi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमारे ज़ख़्म में ठंडक लहू से होती रहती है
तसल्ली दिल की तकलीफ़-ए-रफ़ू से होती रहती है

ज़माना क़द्र-दाँ होता है सूरत और सीरत का
गुलों की क़द्र जैसे रंग-ओ-बू से होती रहती है

नहीं तकलीफ़ से ख़ाली किसी का फूलना-फलना
शजर पर संग-बारी चार-सू से होती रहती है

जो मैं आप आप कहता हूँ हक़ारत वो समझते हैं
मिरी 'इज़्ज़त-फ़ज़ाई लफ़्ज़-ए-'तू' से होती रहती है

क़नाअ'त करती रहती है जो सीपी अब्र-ए-नैसाँ पर
बसर दुर्र-ए-'अदन की आबरू से होती रहती है

है मुझ पर मेहरबानी इस क़दर तकलीफ़-ए-ज़िंदाँ की
कि ख़म गर्दन मिरी तौक़-ए-गुलू से होती रहती है

मयान-मय-कदा जब देर तक साक़ी नहीं मिलता
तशफ़्फ़ी रिंद की जाम-ओ-सुबू से होती रहती है

'उफ़ुक़' की मय-कशी की हाफ़िज़-ए-शीराज़ की सूरत
ज़माने भर में शोहरत लखनऊ से होती रहती है