उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sitam wo ahl-e-mohabbat pe Dhae jate hain

सितम वो अहल-ए-मोहब्बत पे ढाए जाते हैं

ستم وہ اہل محبت پہ ڈھائے جاتے ہیں

शायर: Daniyal Haider Jafri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सितम वो अहल-ए-मोहब्बत पे ढाए जाते हैं
गली से उन की जनाज़े उठाए जाते हैं

नज़र से मेरी छुपा कर तजल्लियाँ अपनी
ज़माने भर को वो जल्वा दिखाए जाते हैं

तुम्हारे हिज्र के क़िस्से ये नामा-बर मेरे
ब-रोज़-ए-हश्र ख़ुदा को सुनाए जाते हैं

हुआ ये हुक्म कि 'आसी झुकाएँ सर अपना
ये रोज़-ए-हश्र है 'आशिक़ उठाए जाते हैं

समा सके न जो दोनों जहान में यारो
क़सम ख़ुदा की वो दिल में समाए जाते हैं

दिखाई देती है तौहीद अब के ख़तरे में
सो तेरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा मिटाए जाते हैं

मिलेंगे वो हमें जन्नत में सोच कर 'हैदर'
तसव्वुरात में जन्नत सजाए जाते हैं