उर्दू शायरी · ग़ज़ल

barq-e-ulfat jo tajalli se jalane nikle

बर्क़-ए-उल्फ़त जो तजल्ली से जलाने निकले

برق الفت جو تجلی سے جلانے نکلے

शायर: Daniyal Haider Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बर्क़-ए-उल्फ़त जो तजल्ली से जलाने निकले
तो सर-ए-राह मोहब्बत के फ़साने निकले

कल ज़माने को सुनाएँगे ये ग़ज़लें मेरी
आज जो हैं मिरी आवाज़ दबाने निकले

हर नज़ारे में नुमायाँ हुआ जल्वा उन का
हुस्न जब हुस्न-परस्तों से छुपाने निकले

आज मारे गए वो अपनी अना के हाथों
जब मुझे बरसर-ए-मैदान बचाने निकले

बा-ख़ुदा जान से जाएँगे ये दुनिया वाले
दर्द-ए-दिल हम जो उन्हें अपना सुनाने निकले

एक लम्हा था तिरे वस्ल का लम्हा इस में
तू न समझेगा मिरे कितने ज़माने निकले

उस को रग़बत थी नए तर्ज़-ए-मोहब्बत से बड़ी
मेरे अंदाज़-ए-मोहब्बत भी पुराने निकले

जब वो गोया हुआ तब उस की ज़बाँ से 'हैदर'
तर्क-ए-उल्फ़त के भी क्या क्या न बहाने निकले