उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab KHana-e-dil mein jo makin hai wo nahin hai

अब ख़ाना-ए-दिल में जो मकीं है वो नहीं है

اب خانۂ دل میں جو مکیں ہے وہ نہیں ہے

शायर: Daniyal Haider Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब ख़ाना-ए-दिल में जो मकीं है वो नहीं है
तू सोच रहा है वो यहीं है वो नहीं है

ऐ दिल तुझे किस तरह मैं समझाऊँ कि तुझ को
जिस शख़्स के होने का यक़ीं है वो नहीं है

वो कुफ़्र का 'आलम है कि लगता है कभी तो
जो ज़ात रग-ए-जाँ से क़रीं है वो नहीं है

क्या इस पे कहें ख़ुद को कि इक 'अर्से से जिस की
नक़्श-ए-कफ़-ए-पा पर ये जबीं है वो नहीं है

किस तरह चला जाऊँ तिरी ख़ुल्द में वा'इज़
गो ठीक है ये ख़ुल्द-ए-बरीं है वो नहीं है

सद-हैफ़ ब-सद-नाज़ गँवाया मुझे उस ने
मैं तो ये समझता था ज़हीं है वो नहीं है

क्यूँकर नहीं करता तू ये तस्लीम हक़ीक़त
अब वो तिरी क़िस्मत में नहीं है वो नहीं है

'हैदर' वो मिरी जान बहुत दूर है तुझ से
अब छोड़ दे कहना वो यहीं है वो नहीं है