उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sitare sameTo sahar ho rahi hai

सितारे समेटो सहर हो रही है

ستارے سمیٹو سحر ہو رہی ہے

शायर: Faizan Jaffery Al-Khwarzami8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सितारे समेटो सहर हो रही है
रिदा-ए-तमन्ना भी तर हो रही है

जिन्हें ज़िंदगी ने बहुत कुछ दिया है
उन्ही पर तुम्हारी नज़र हो रही है

तिरे रू-ब-रू पेश होने की ख़ातिर
मिरी ज़ात ज़ेर-ओ-ज़बर हो रही है

सँभालो कमर को कि ज़ोर-ए-हवा से
इधर हो रही है उधर हो रही है

करूँ कैसे तर्क-ए-फ़रेब-ए-तमन्ना
इसी पर तो अपनी गुज़र हो रही है

हमारे सवालों पे ऐ बे-मुरव्वत
अगर हो रही है मगर हो रही है

तुम्हारी म’इय्यत में ऐ हासिल-ए-कुल
मिरी ज़िंदगी बे-समर हो रही है

मुझे यूँ लगा जैसे तुम ने कहा हो
हमारे बिना क्या बसर हो रही है