उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dard sharminda-e-izhaar nahin ho sakta

दर्द शर्मिंदा-ए-इज़हार नहीं हो सकता

درد شرمندۂ اظہار نہیں ہو سکتا

शायर: Faizan Jaffery Al-Khwarzami4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर्द शर्मिंदा-ए-इज़हार नहीं हो सकता
जैसे सहरा कभी गुलज़ार नहीं हो सकता

मैं समझता था जिसे घाग अनाड़ी निकला
हर अदाकार तो फ़नकार नहीं हो सकता

ये मोहब्बत से भी आगे की कोई शय होगी
एक ही शख़्स से फिर प्यार नहीं हो सकता

ज़ख़्म देता है कुछ ऐसा जो सदा रिस्ता है
शे'र कब ख़ंजर-ओ-तलवार नहीं हो सकता