उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chand ko bar-zamin utara hai

चाँद को बर-ज़मीं उतारा है

چاند کو بر زمیں اتارا ہے

शायर: Faizan Jaffery Al-Khwarzami8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाँद को बर-ज़मीं उतारा है
आज किस ने तुझे सँवारा है

जिस्म-ओ-जाँ में हयात बहती है
दिल मगर तीसरा किनारा है

ज़िंदगी के हर इक झमेले में
मैं ने तुझ को ही तो पुकारा है

कार-गाह-ए-ख़याल-ए-जानाँ में
मैं ने हर नक़्श को निखारा है

मैं तो बचपन से ये समझता हूँ
चाँद रोटी का इस्ति'आरा है

तिश्नगी और ग़ुरूर दरिया में
कौन जीता है कौन हारा है

रहम-ओ-लुत्फ़-ओ-करम से हट कर क्या
बंदगी का कोई सहारा है

तेरे माथे की रौशनी में 'अयाँ
रात का आख़िरी सितारा है