उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shahron ke shor-o-ghul se koi wasta na ho

शहरों के शोर-ओ-ग़ुल से कोई वास्ता न हो

شہروں کے شور و غل سے کوئی واسطہ نہ ہو

शायर: Zafar Mirzapuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शहरों के शोर-ओ-ग़ुल से कोई वास्ता न हो
जी चाहता है कोई मिरा आश्ना न हो

पहले तो इतनी भीड़ न आती थी गाँव से
शहरों की दिल-कशी में इज़ाफ़ा हुआ न हो

खिलते थे पहले फ़िक्र के गुल शाख़-ए-ज़ेहन से
दौर-ए-ख़िज़ाँ ने ज़ीस्त पे क़ब्ज़ा किया न हो

क्यूँ दोपहर में बच्चे परेशान घर में हैं
आमों का पेड़ उन के लिए झूमता न हो

दो बूँद के निशान हैं ख़त के जवाब में
काग़ज़ पे उस की आँख से आँसू गिरा न हो

मत दीजे उस के हाथ को इल्ज़ाम ख़ून का
नाज़ुक हथेलियों पे वो रंग-ए-हिना न हो

कहती है ख़ाक-ए-क़ब्र ये नख़वत-तराज़ से
वो कौन है जो दहर में आ के फ़ना न हो

इस होड़ में हैं सब के मकाँ आग पर 'ज़फ़र'
मेरे मुक़ाबले में कोई दूसरा न हो