उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shahr mahfuz nahin aur Thikana hai koi

शहर महफ़ूज़ नहीं और ठिकाना है कोई

شہر محفوظ نہیں اور ٹھکانہ ہے کوئی

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शहर महफ़ूज़ नहीं और ठिकाना है कोई
कोई जंगल है यहाँ पास में सहरा है कोई

वैसे सोचा था मोहब्बत नहीं करनी मुझ को
इस लिए की कि कभी पूछ ही लेता है कोई

आप की आँखें तो सैलाब-ज़दा ख़ित्ते हैं
आप के दिल की तरफ़ दूसरा रस्ता है कोई

दुख मुझे इस का नहीं है कि दुखी है वो शख़्स
दुख तो ये है कि सबब मेरे 'अलावा है कोई

जानता हूँ कि तुझे साथ तो रखते हैं कई
पूछना था कि तिरा ध्यान भी रखता है कोई

दो मिनट बैठ मैं बस आइने तक हो आऊँ
उस में इस वक़्त मुझे देखने आता है कोई

ख़ौफ़ बोला कोई है जिस को बुलाना है बुला
देर तक सोच के मैं ज़ोर से चीख़ा है कोई