उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shab-e-firaq mein bhi wasl sa surur raha

शब-ए-फ़िराक़ में भी वस्ल सा सुरूर रहा

شب فراق میں بھی وصل سا سرور رہا

शायर: Saa’in Alig5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शब-ए-फ़िराक़ में भी वस्ल सा सुरूर रहा
रहा न पास मिरे वो न मुझ से दूर रहा

करेंगे 'इश्क़ उड़ाएँगे ख़ाक सहरा में
कि कम-सिनी से हमें इक यही फ़ुतूर रहा

कलीम हसरतें करते ही रह गए आख़िर
मगर नसीब तो देखो कि नज़्र-ए-तूर रहा

सरा-ए-दिल में नहीं इक ज़रा भी तन्हाई
कोई न कोई यहाँ दम-ब-दम ज़रूर रहा

'अजीब हाल है 'साइन' कहें तो किस से कहें
कि पस्तियों पे हमें किस क़दर ग़ुरूर रहा