उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ai rabb-e-kainat mujhe le panah mein

ऐ रब्ब-ए-काएनात मुझे ले पनाह में

اے رب کائنات مجھے لے پناہ میں

शायर: Saa’in Alig6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ऐ रब्ब-ए-काएनात मुझे ले पनाह में
बहता ही जा रहा हूँ ख़लीज-ए-गुनाह में

तस्वीर-ए-शब में हिकमत-ए-हाकिम तो देखिए
खिलता है नूर-ए-माह लिबास-ए-सियाह में

उन की गली में आ तो गए हैं मगर ये दिल
करता है ज़िद कि आइए उन की निगाह में

बे-सूद है ये 'इल्म-ओ-ज़िहानत ये फ़ल्सफ़ा
समझें अगर न फ़र्क़ सफ़ेद-ओ-सियाह में

ले कर पुरानी साँस को देती है फिर नई
क़ुव्वत कहाँ से आई है ऐसी गयाह में

'साइन' ग़ज़ल पे दाद मिली है तो ख़ुश न हो
कुछ और ही छुपा है रफ़ीक़ों की वाह में