उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham se qabl andhera ho jae

शाम से क़ब्ल अँधेरा हो जाए

شام سے قبل اندھیرا ہو جائے

शायर: Vikas Sharma Raaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाम से क़ब्ल अँधेरा हो जाए
क्या करे कोई जो ऐसा हो जाए

मैं कि गिर्ये का नहीं हूँ मुनकिर
एक दो रोज़ का वक़्फ़ा हो जाए

और इक बूँद सियाही की गिरे
रंग तन्हाई का गहरा हो जाए

काश इक रोज़ बशारत हो मुझे
मेरे अतराफ़ उजाला हो जाए

उस पे खुलता है ग़ुबार-ए-हस्ती
ख़ाक उड़ाने में जो यकता हो जाए

तू मिरे साथ अगर इस्म पढ़े
इस रवाँ आब में रस्ता हो जाए