उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham ke gesu phaile hue the mahke mahke sae the

शाम के गेसू फैले हुए थे महके महके साए थे

شام کے گیسو پھیلے ہوئے تھے مہکے مہکے سائے تھے

शायर: Nafees Ghazipuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाम के गेसू फैले हुए थे महके महके साए थे
हम सदियों के जागे हुए थे ख़्वाब में चल कर आए थे

शाम के पिछले ज़मीनों से जब सूरज उतरा घाटी में
तन्हाई के बढ़ते साए ज़हर का प्याला लाए थे

टूटे हुए ख़्वाबों की किर्चें आँखों में चुभती ही रहीं
हाथ हवा के पोंछते यूँ तो मेरे आँसू आए थे

ग़म की खेती सूख रही थी दिल की धरती बंजर थी
छागल छागल आँसू ले कर तर करने वो आए थे

बैठे हुए कुछ सोच रहे थे गाँव के पीपल के नीचे
बुझता हुआ सूरज था हम थे ढलती शाम के साए थे

बारिश की इक बूँद को तरसा सहरा दिल का अब के 'नफ़ीस'
कहने को तो प्यार के बादल चारों तरफ़ ही छाए थे