उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haalanki bhare ghar mein to ab koi nahin hai

हालाँकि भरे घर में तो अब कोई नहीं है

حالانکہ بھرے گھر میں تو اب کوئی نہیں ہے

शायर: Nafees Ghazipuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हालाँकि भरे घर में तो अब कोई नहीं है
परछाईं कोई डर के मगर अब भी वहीं है

ये नश्शा-ए-ग़म मुझ को सँभलने नहीं देता
रखता हूँ कहीं पाँव तो पड़ जाता कहीं है

हाथ अपने लपकते हैं कि छू लें मह-ओ-अंजुम
पाओं में मगर सूरत-ए-ज़ंजीर ज़मीं है

पढ़ सकता अगर हो तो पढ़े सारा ज़माना
तू जिस पे है तहरीर वो मेरी ही जबीं है

ये दश्त-ओ-दमन कुछ भी नहीं हैं मिरे आगे
फैला हुआ सहरा भी मिरे ज़ेर-ए-नगीं है

लगता है 'नफ़ीस' अब कि बदल जाएगा मौसम
अब शाम के चेहरे पे उदासी भी नहीं है