उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har uljhan se agar nikla nahin wo

हर उलझन से अगर निकला नहीं वो

ہر الجھن سے اگر نکلا نہیں وہ

शायर: Nafees Ghazipuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर उलझन से अगर निकला नहीं वो
बिछड़ जाए न ख़ुद से भी कहीं वो

नदी और प्यास दोनों दरमियाँ हैं
जहाँ हूँ मुद्दतों से मैं वहीं वो

नशा कैसा है उस के देखने में
सुराही वो नहीं साग़र नहीं वो

उसे क्यों नाज़ है ज़ोर-ए-नुमू पर
मैं बादल हूँ अगर भीगी ज़मीं वो

मैं जा सकता हूँ उस को छोड़ कर भी
अभी इस बात को समझा नहीं वो

सितारो क्यों लरज़ते हो अभी से
अभी तो रक़्स को उट्ठा नहीं वो

अचानक ही उठेगा कोई तूफ़ाँ
कहीं होंगे 'नफ़ीस' आप और कहीं वो