उर्दू शायरी · ग़ज़ल

samay na dekh abhi guftugu chali hi to hai

समय न देख अभी गुफ़्तुगू चली ही तो है

سمے نہ دیکھ ابھی گفتگو چلی ہی تو ہے

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

समय न देख अभी गुफ़्तुगू चली ही तो है
मैं रोक दूँगा किसी वक़्त भी घड़ी ही तो है

भटकता रहता हूँ दिन भर उजाड़ कमरों में
वसीअ' घर में तजर्रुद भी बे-घरी ही तो है

हसीन होती है मर्ज़ी की मौत सामने देख
ये आबशार भी दरिया की ख़ुदकुशी ही तो है

तिरा जुनून है जब तक तू हज़ उठा ख़ुश रह
कि 'आरज़ी है मिरे दोस्त 'आरज़ी ही तो है

तिरे बदन के मुताबिक़ ढलेगी कुछ दिन तक
अभी चुभेगी उदासी अभी नई ही तो है

हमारे दीन में जाएज़ है तीन रोज़ का सोग
बिछड़ के उस से अभी रात दूसरी ही तो है

इसी को बाँटते रहते हैं मिलने वालों में
हमारे पास इज़ाफ़ी तिरी कमी ही तो है