उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sajda-e-shaiKH pe laghzish ka guman hota hai

सज्दा-ए-शैख़ पे लग़्ज़िश का गुमाँ होता है

سجدۂ شیخ پہ لغزش کا گماں ہوتا ہے

शायर: Kamal Ahmad Siddiqi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सज्दा-ए-शैख़ पे लग़्ज़िश का गुमाँ होता है
मेरी मस्ती पे परस्तिश का गुमाँ होता है

हमनशीं तुझ से वो सदमात उठाए हैं कि अब
मेहरबानी पे भी साज़िश का गुमाँ होता है

वक़्त-ओ-माहौल का हालात का ख़म्याज़ा है
जिस पे साक़ी की नवाज़िश का गुमाँ होता है

पस-ए-चिलमन हैं तो चिलमन को उठा ही दीजे
इस तकल्लुफ़ पे नुमाइश का गुमाँ होता है

बात क्या है कि तिरे ख़त के हर इक जुमले पर
अपने अंदाज़-ए-निगारिश का गुमाँ होता है

उन के चेहरे की ज़िया है कि मिरे दिल की चमक
कुछ तो है जिस पे ये ताबिश का गुमाँ होता है

गर्दिश-ए-चश्म नहीं गर्दिश-ए-दौराँ है 'कमाल'
जिस पे पैमानों की गर्दिश का गुमाँ होता है