उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haqiqaton ka aks ek KHwab-zar hi na ho

हक़ीक़तों का 'अक्स एक ख़्वाब-ज़ार ही न हो

حقیقتوں کا عکس ایک خواب زار ہی نہ ہو

शायर: Kamal Ahmad Siddiqi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हक़ीक़तों का 'अक्स एक ख़्वाब-ज़ार ही न हो
ये आइना भी ज़िंदगी का राज़दार ही न हो

मिरी वो इक निगाह कोई शाहकार ही न हो
किसी हसीन ज़िंदगी का ए'तिबार ही न हो

फ़ज़ाओं का सुकूत ख़ुश्क पत्तियों के साज़ पर
किसी उदास लय में नग़्मा-ए-बहार ही न हो

शफ़क़ ‘उरूस-ए-शाम के लबों का आतिशीं-ख़याल
किसी सुनहरे आफ़्ताब का मज़ार ही न हो

वो इक नज़र जो तेरी सम्त उठ गई कभी कभी
हमारी कम-निगाहियों की पर्दा-दार ही न हो

फुवार के हसीन रक़्स में न आए ज़िंदगी
अगर ये पत्तियों पे हल्का सा ग़ुबार ही न हो

सुकूँ हमारी क़ुव्वतों की बरहमी से काँप उठा
सुकूँ हमारी क़ुव्वतों का इंतिशार ही न हो

ख़ुद अपनी तल्ख़ियों में ज़िंदगी भी खो के रह गई
हक़ीक़तों से खेलना भी इक फ़रार ही न हो

सुरूद-ओ-रक़्स और जाम का 'कमाल' का जहाँ
बहिश्त भी तख़य्युल-ए-गुनाहगार ही न हो