उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mera sar kab kisi darbar mein KHam hota hai

मेरा सर कब किसी दरबार में ख़म होता है

میرا سر کب کسی دربار میں خم ہوتا ہے

शायर: Kamal Ahmad Siddiqi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मेरा सर कब किसी दरबार में ख़म होता है
कूचा-ए-यार में लेकिन ये क़दम होता है

पुर्सिश-ए-हाल भी इतनी कि मैं कुछ कह न सकूँ
इस तकल्लुफ़ से करम हो तो सितम होता है

शैख़ मय-ख़ाने में करता है इरम की बातें
इसी मय-ख़ाने का इक गोशा इरम होता है

एक दिल है कि उजड़ जाए तो बस्ता ही नहीं
एक बुत-ख़ाना है उजड़े तो हरम होता है

राहबर राह-नवर्दी से परेशाँ है 'कमाल'
जिस तरफ़ जाए मिरा नक़्श-ए-क़दम होता है