उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har baat jo ghalat thi purane nisab mein

हर बात जो ग़लत थी पुराने निसाब में

ہر بات جو غلط تھی پرانے نصاب میں

शायर: Kamal Ahmad Siddiqi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर बात जो ग़लत थी पुराने निसाब में
चुन चुन के उस को रक्खा गया है किताब में

जो रू-ब-रू कहा न गया इज़्तिराब में
कह दूँगा आप याद करेंगे जो ख़्वाब में

होश-ओ-हवास ही तो हैं जौहर हयात का
आता है होश ज़ेहन जो डूबे शराब में

माज़ी के वाक़ि'आत नज़र आए सामने
आईना मेरे हाथ में था मैं था ख़्वाब में

चाहो तो मेरे जाम में इस को निचोड़ दो
दामन तुम्हारा भीग गया है शराब में

जो कल हक़ीक़तें थीं हिकायात बन गईं
होते रहेंगे रोज़ इज़ाफ़े किताब में

ये ज़ेहन है कि कारगह-ए-आइना-गराँ
ये सारी काएनात है इक लम्हा ख़्वाब में

पानी की तरह अहल-ए-हवस ने शराब पी
लिक्खी गई है तिश्ना-लबों के हिसाब में

वो रात भी थी कितनी हसीं रात ऐ 'कमाल'
वो रात जो कटी है सवाल-ओ-जवाब में