उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sainkaDon phul lagae magar aisa na hua

सैंकड़ों फूल लगाए मगर ऐसा न हुआ

سینکڑوں پھول لگائے مگر ایسا نہ ہوا

शायर: Dawood Syed7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सैंकड़ों फूल लगाए मगर ऐसा न हुआ
मेरा आँगन तिरे रुख़्सार से गहरा न हुआ

उस ने जो ज़ख़्म लगाए थे वो शादाब रहे
उस ने जो रंग लगाया था वो हल्का न हुआ

दस्तख़त और के हैं लम्स किसी और का है
या'नी ये नाम भी इस पेड़ पे पहला न हुआ

काश मैं अपने मुक़द्दर में उसे लिख पाता
काश वैसा कभी होता अभी जैसा न हुआ

दिल को अब कार-ए-मोहब्बत पे हँसी आती है
गो ये दामन तिरे बोहतान से मैला न हुआ

अश्क ले जाऊँगा जलते हुए ख़ेमों की तरफ़
गर मिरे हाथ कोई दूसरा दरिया न हुआ

क़ाबिल-ए-दार था मैं क़ाबिल-ए-दस्तार नहीं
मुझ को अफ़सोस है अज्दाद का अच्छा न हुआ