उर्दू शायरी · ग़ज़ल

safar tha panw se lipTa safar mein rahna tha

सफ़र था पाँव से लिपटा सफ़र में रहना था

سفر تھا پاؤں سے لپٹا سفر میں رہنا تھا

शायर: Qamar Sanbhali8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सफ़र था पाँव से लिपटा सफ़र में रहना था
कहाँ नसीब हमें अपने घर में रहना था

जो नक़्श खींचूँ मैं काग़ज़ पे शाहकार बने
कमाल इतना तो दस्त-ए-हुनर में रहना था

अब अपने सहन से किर्चें समेटते रहिए
कुछ एहतियात से शीशे के घर में रहना था

हवा के रुख़ की तुम्हें कुछ ख़बर न तूफ़ाँ की
तुम्हारी नाव को फिर तो भँवर में रहना था

ज़रूर कोई कमी थी ख़ुलूस में वर्ना
मिरी दु'आओं को बाब-ए-असर में रहना था

ये कैसे छूट गया एहतियात का दामन
हमें तो उन के हिसार-ए-नज़र में रहना अथा

वो सहल राह कोई इख़्तियार क्या करते
जिन्हें हमेशा रह-ए-पुर-ख़तर में रहना था

कुछ अपना हक़ भी तो बनता था रौशनी पे 'क़मर'
कोई चराग़ हमारे भी घर में रहना था