उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sach hua KHwab to tabir nahin khinch saka

सच हुआ ख़्वाब तो ता'बीर नहीं खींच सका

سچ ہوا خواب تو تعبیر نہیں کھینچ سکا

शायर: Aadil Farhat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सच हुआ ख़्वाब तो ता'बीर नहीं खींच सका
मैं तिरे जिस्म पे तहरीर नहीं खींच सका

मैं ने चाहा था तिरे दर्द से महज़ूज़ रहूँ
दर्द भी वो कि जिसे 'मीर' नहीं खींच सका

मुद्दतों बा'द तिरे साथ किसी को देखा
इतना घबराया कि तस्वीर नहीं खींच सका

वो नज़र आई मुझे रेल की खिड़की से मगर
तय-शुदा वक़्त में ज़ंजीर नहीं खींच सका

रोज़ लड़ता हूँ मैं ख़ुद अपने ही साए के ख़िलाफ़
वो शजर हूँ कि जो रहगीर नहीं खींच सका

तेरे शाने को मयस्सर हैं सभी सर लेकिन
अपने शाने में वो तासीर नहीं खींच सका