उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud udasi mein to apni ye kami rakkhi hai

ख़ुद उदासी में तो अपनी ये कमी रक्खी है

خود اداسی میں تو اپنی یہ کمی رکھی ہے

शायर: Aadil Farhat5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद उदासी में तो अपनी ये कमी रक्खी है
साथ जब तक है वो चेहरे पे हँसी रक्खी है

वो कभी सूखते पेड़ों को तो पानी देगा
मैं ने इस वास्ते इक टहनी हरी रक्खी है

वक़्त से बढ़ के अज़िय्यत ही नहीं दुनिया में
जाने किस वास्ते अल्लह ने घड़ी रक्खी है

जो उदासी की ज़रूरत हो तो मुझ से कहना
मेरे हाथों की लकीरों में झड़ी रक्खी है

कितने ही साँप यहाँ आ के पड़े रहते हैं
इस लिए आस्तीं दिल से भी बड़ी रक्खी है