उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi sukun kabhi hum ghuTan ki nazr hue

कभी सुकून कभी हम घुटन की नज़्र हुए

کبھی سکون کبھی ہم گھٹن کی نذر ہوئے

शायर: Aadil Farhat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी सुकून कभी हम घुटन की नज़्र हुए
हम ऐसे लोग तो अपने ही मन की नज़्र हुए

पुराने इश्क़ की चोटें अभी बदन पर थीं
सो इश्क़ छोड़ दिया और बदन की नज़्र हुए

तमाम उम्र गुज़ारी है शे'र कहने में
हमारे रात भी दिन भी सुख़न की नज़्र हुए

ये किस के ख़ून से रंगी गई हैं दीवारें
ये किस के ख़्वाब थे जो इस चमन की नज़्र हुए

नज़र उठा के जो देखा पलक झपकने लगी
तुम्हारी दीद के मंज़र किरन की नज़्र हुए

हमारी इश्क़ से 'फ़रहत' कभी बनी ही नहीं
बस उस की बात रखी और मिलन की नज़्र हुए