उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sab karobar-e-naqd-o-nazar chhoDna paDa

सब कारोबार-ए-नक़्द-ओ-नज़र छोड़ना पड़ा

سب کاروبار نقد و نظر چھوڑنا پڑا

शायर: Zaheer Ahmad6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सब कारोबार-ए-नक़्द-ओ-नज़र छोड़ना पड़ा
बिकने लगे क़लम तो हुनर छोड़ना पड़ा

क़ुर्बानी माँगती थी हर इक शाख़-ए-बे-समर
बसने न पाए थे कि शजर छोड़ना पड़ा

करना था जो सफ़र हमें हम ने नहीं किया
बच्चों को आज इस लिए घर छोड़ना पड़ा

आ तो गए हो सोच लो जाओगे फिर कहाँ
ये शहर-ए-बद-लिहाज़ अगर छोड़ना पड़ा

घर से चला था बार-ए-सक़ाफ़त उठा के मैं
रस्ते में थोड़ा थोड़ा मगर छोड़ना पड़ा

नफ़रत के साँप आ गए घर तक तो मैं 'ज़हीर'
इतना डरा कि ख़ौफ़-ए-सफ़र छोड़ना पड़ा