उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sab intizar mein the kab koi zaban khule

सब इंतिज़ार में थे कब कोई ज़बान खुले

سب انتظار میں تھے کب کوئی زبان کھلے

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सब इंतिज़ार में थे कब कोई ज़बान खुले
फिर उस के होंठ खुले और सब के कान खुले

भले हो लाख हसीं ख़्वाब याद रहता नहीं
जब आँख दर्जनों लोगों के दरमियान खुले

बहुत सा लेंगे किराया ज़रा सी देंगे जगह
यहाँ के लोगों के दिल तंग हैं मकान खुले

हमारी आँख में खद्दर के ख़्वाब बिकते थे
तुम आए और यहाँ बोस्की के थान खुले

गया वो शख़्स तो नज़रें उठाईं लोगों ने
हवा थमी तो जहाज़ों के बादबान खुले

जगह हो उस में कम-अज़-कम मिरे यक़ीं के लिए
मैं चाहता हूँ कि इतना तिरा गुमान खुले

ये कौन भूल गया उन लबों का ख़ाका यहाँ
ये कौन छोड़ गया गुड़ के मर्तबान खुले