उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sath hum ko zamane ke chalna paDa

साथ हम को ज़माने के चलना पड़ा

ساتھ ہم کو زمانہ کے چلنا پڑا

शायर: Lokesh Tripathi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साथ हम को ज़माने के चलना पड़ा
सब बदलने लगे तो बदलना पड़ा

पेट की आग जब बुझ नहीं पाई तो
जिस्म को भट्टियों में पिघलना पड़ा

जब अँधेरों की साज़िश घनी हो गई
सूर्य को रात में फिर निकलना पड़ा

वक़्त पर उस को हाँ बस नहीं कह सका
ज़िंदगी भर मुझे हाथ मलना पड़ा

दूसरों के लिए जो हैं छाया बने
बन के छत धूप में उन को जलना पड़ा