उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baat koi kabhi manti hi nahin

बात कोई कभी मानती ही नहीं

بات کوئی کبھی مانتی ہی نہیں

शायर: Lokesh Tripathi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बात कोई कभी मानती ही नहीं
है ये जैसे मिरी ज़िंदगी ही नहीं

कट गया था सफ़र साथ जिस के मिरा
वो सफ़र में दुबारा मिली ही नहीं

अब की जाते हुए इस तरह से गई
ऐसा लगता है जैसे गई ही नहीं

दोस्त हैं वो पुराने अभी भी मगर
बात अब वो पुरानी रही ही नहीं

राह में इक मरुस्थल था प्यासा खड़ा
पर नदी वो ज़रा भी रुकी ही नहीं