उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sare dukh is dukh mein zam karte rahte hain

सारे दुख इस दुख में ज़म करते रहते हैं

سارے دکھ اس دکھ میں ضم کرتے رہتے ہیں

शायर: Vikas Sharma Raaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सारे दुख इस दुख में ज़म करते रहते हैं
अपने होने का मातम करते रहते हैं

आने वाली रुत की पज़ीराई के बदले
जाने वाली रुत का ग़म करते रहते हैं

यकजा हो जाएँ तो वहशत घट जाती है
सो ख़ुद को दरहम-बरहम करते रहते हैं

काम बड़े होते हैं हम को तन्हाई में
खद्दर लफ़्ज़ों को रेशम करते रहते हैं

मुहलिक होते हैं ये छोटे-मोटे ग़म भी
जीवन की लौ को मद्धम करते रहते हैं

पलकें मूँद के पहले दश्त बनाते हैं हम
और फिर बैठे-बैठे रम करते रहते हैं