उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saqiya kaun gaya ruTh ke maiKHane se

साक़िया कौन गया रूठ के मयख़ाने से

ساقیا کون گیا روٹھ کے میخانے سے

शायर: Ghaibi Jaunpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साक़िया कौन गया रूठ के मयख़ाने से
जाम मिल मिल के गले रोते हैं पैमाने से

है वही कश्मकश-ए-ज़ीस्त का 'आलम अब तक
बार-ए-ग़म आज भी कम हो न सका शाने से

अब तो इस पेड़ के साए से भी डर लगता है
क़ाफ़िले कितने लुटे हैं यहाँ रुक जाने से

आप इस घर में जो आए हैं तो यूँ लगता है
चाँदनी खेल रही है किसी वीराने से

शीशा-ए-दिल को जुदा संग-दिलों से रखना
टूट सकता है किसी वक़्त भी टकराने से

मेरा ग़म तो ग़म-ए-दुनिया है ज़माने वालो
इस को तश्बीह न दो क़ैस के अफ़्साने से

किस की क़िस्मत में लिखा किस को पता क्या 'ग़ैबी'
काम अपना है फ़क़त यार के याराने से