उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHuda jaane kahan ye fikr ka rahwar le jae

ख़ुदा जाने कहाँ ये फ़िक्र का रहवार ले जाए

خدا جانے کہاں یہ فکر کا رہوار لے جائے

शायर: Ghaibi Jaunpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुदा जाने कहाँ ये फ़िक्र का रहवार ले जाए
समंदर में डुबा दे या समंदर पार ले जाए

लगाना हो जिसे अपने सफ़ीने को किनारे से
मैं दे दूँगा मगर वो माँग कर पतवार ले जाए

मैं यूसुफ़ तो नहीं लेकिन ज़ुलेख़ा-ए-जहाँ सुन लें
न हो जिस को यक़ीं मुझ को सर-ए-बाज़ार ले जाए

भिकारी बन के आता हूँ कभी ये आप ने सोचा
कहाँ तक आप के दर से कोई इंकार ले जाए

वो मेरी नफ़रतों से ख़त्म कर के वास्ता अपना
कोई दुश्मन भी हो मेरा तो मुझ से प्यार ले जाए

ये बातें हैं अलग साँसें मिरी थमने को हैं लेकिन
मैं जब तक हूँ दवा सेहत की हर बीमार ले जाए

यक़ीं है जीत लेगा दिल वो सारे सुनने वालों का
अगर महफ़िल में 'ग़ैबी' को कोई इक बार ले जाए