उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saf ruKH par jama ghubar karo

साफ़ रुख़ पर जमा ग़ुबार करो

صاف رخ پر جما غبار کرو

शायर: Ghaibi Jaunpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साफ़ रुख़ पर जमा ग़ुबार करो
आइने को न संगसार करो

लुत्फ़ देती नहीं अधूरी बात
तीर मारो तो दिल के पार करो

न बनो दुश्मनी के सौदागर
दोस्ती का भी कारोबार करो

भूल जाए वो अपने आप को भी
यूँ किसी को न बे-क़रार करो

हौसले खो गए न जाने कहाँ
अब न ज़िक्र-ए-सलीब-ओ-दार करो

अब तो 'ग़ैबी' का मशवरा है यही
दुश्मनों पर भी ए'तिबार करो