उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sahib-e-taKHt hai muqaddar se

साहिब-ए-तख़्त है मुक़द्दर से

صاحب تخت ہے مقدر سے

शायर: Balwant Singh7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साहिब-ए-तख़्त है मुक़द्दर से
जो निकाला गया था लश्कर से

अब भी है वक़्त लौट आओ तुम
पानी गुज़रा नहीं अभी सर से

इश्क़ ऐसा की मौत आने पर
वो भी निकलेगा मेरे अंदर से

ज़हर खाना ही पड़ गया आख़िर
पेट राज़ी नहीं था पत्थर से

तुम ने अच्छा किया जुदा हो कर
इक बला टल गई मिरे सर से

मैं बताता हूँ क्या बला है इश्क़
इश्क़ इक जंग है मुक़द्दर से

दुश्मनों को भी उस ने दावत दी
चाहने वाले दीद को तरसे