उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jism se dur the ki lat bhi to lag sakti thi

जिस्म से दूर थे कि लत भी तो लग सकती थी

جسم سے دور تھے کہ لت بھی تو لگ سکتی تھی

शायर: Balwant Singh8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस्म से दूर थे कि लत भी तो लग सकती थी
हम को इस खेल की आदत भी तो लग सकती थी

जब गले मेरे मुसीबत ही कोई लगनी थी
तो गले से ये मोहब्बत भी तो लग सकती थी

उन को हर हाल मिरा क़त्ल था करना वर्ना
मेरे ईमान की क़ीमत भी तो लग सकती थी

कम से कम नाम नदामत से न लें बच्चे मेरे
मुझ से ऐसी कोई तोहमत भी तो लग सकती थी

सैकड़ों बार लगी हाथ ये ग़म की दौलत
इक दफ़ा हाथ मसर्रत भी तो लग सकती थी

दोस्ती तुम से बढ़ाने में ये ख़तरा था मुझे
दोस्ती तुम को मोहब्बत भी तो लग सकती थी

जैसे दुनिया की तुम्हें आब-ओ-हवा रास आई
तुम को अच्छी मिरी सोहबत भी तो लग सकती थी

मैं ने इस डर से बुलाया नहीं मिलने तन्हा
तुम को खोटी मिरी निय्यत भी तो लग सकती थी