उर्दू शायरी · ग़ज़ल

palaT jaane ka KHatra ho agar bilkul kinare hi

पलट जाने का ख़तरा हो अगर बिल्कुल किनारे ही

پلٹ جانے کا خطرہ ہو اگر بالکل کنارے ہی

शायर: Balwant Singh11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पलट जाने का ख़तरा हो अगर बिल्कुल किनारे ही
शिकस्ता नाव फिर दरिया में कोई क्यों उतारे ही

वगरना फ़ैसला मुंसिफ़ हमारे हक़ में जाएगा
हमारा फ़ैसला करना बिना सोचे-विचारे ही

जिसे कहते हैं सब दुनिया ये वो बाज़ार है जिस में
मोहब्बत ढूँढने वाले फिरेंगे मारे मारे ही

अब अक्सर नफ़रतों की आग ही उठती है धरती से
अब अक्सर आसमाँ से भी बरसते हैं शरारे ही

ज़रूरत लब-कुशाई की नहीं कुछ ख़ास है इस में
मोहब्बत में ज़ियादा काम आते हैं इशारे ही

दुआ जब ख़ास कोई माँगनी होगी हमें उस वक़्त
गिरेंगे बाल पलकों से न टूटेंगे सितारे ही

मोहब्बत की तरह हम से सियासत पेश आती है
न रखती है क़रीब अपने न करती है किनारे ही

ख़ुशी का आसरा होगा यहाँ मुश्किल से पल-दो-पल
कटेगी उम्र दुनिया में फ़क़त ग़म के सहारे ही

मोहब्बत में नज़र तुम पर नहीं जाएगी दुनिया की
सभी इल्ज़ाम रक्खे जाएँगे सर पर हमारे ही

कहाँ से लाएँगे इतना बुझाने के लिए पानी
ज़मीं पर दिखते हैं हर-सू हमें जलते नज़ारे ही

मोहब्बत बेचने निकलो फ़क़त इस शर्त पर 'बलवंत'
लगेंगे हाथ इस ब्योपार में केवल ख़सारे ही