उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gila kaisa koi pardes mein apna nahin hota

गिला कैसा कोई परदेस में अपना नहीं होता

گلہ کیسا کوئی پردیس میں اپنا نہیں ہوتا

शायर: Balwant Singh14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गिला कैसा कोई परदेस में अपना नहीं होता
किसी सहरा में सर पर पेड़ों का साया नहीं होता

है अपनी ज़ीस्त की मिट्टी की कुछ तासीर ही ऐसी
कि इस के बाग़ का कोई भी फल मीठा नहीं होता

बरी हो जाती है इक भीड़ अपने सब गुनाहों से
इसी इक बात से कि भीड़ का चेहरा नहीं होता

तुम्हारी बज़्म में क्या काम है हम जैसे लोगों का
जहाँ पत्थर ही पत्थर हों वहाँ शीशा नहीं होता

ख़सारे इश्क़ के बतलाओ पर ये भी तो बतलाओ
वो है क्या काम कि जिस में कोई ख़तरा नहीं होता

हमारे पाँव की बेड़ी हमारी सोच होती है
कोई पत्थर हमारी राह का रोड़ा नहीं होता

कोई कुछ भी कहे लेकिन ये भी अपनी जगह सच है
किसी पर शक कोई यूँही कभी पैदा नहीं होता

मुकम्मल चाँद पर जाने का सपना हो गया कब का
मोहब्बत का ही सपना जाने क्यों पूरा नहीं होता

परिंदे पूछते फिरते पता क्यूँकर के पिंजरों का
अगर कुछ आसमानों में इन्हें ख़तरा नहीं होता

निकलती है सदा कड़वी से कड़वी बात ही जिन से
उन्हीं लब का दिया बोसा कभी कड़वा नहीं होता

हमारे दिल के जंक्शन पर मोहब्बत नाम है जिस का
कभी ग़लती से भी उस ट्रेन का रुकना नहीं होता

मुआ'फ़ी माँग कर हैरत में डालो मत हमें 'बलवंत'
यहाँ अपने किए पर कोई शर्मिंदा नहीं होता

इसी ख़ातिर मैं दुश्मन की कभी गिनती नहीं करता
मुझे मालूम है के भीड़ का चेहरा नहीं होता

मियाँ फ़र्हाद-ओ-मजनूँ से तो आशिक़ आज का अच्छा
कम-अज़-कम इश्क़ में अब जान का ख़तरा नहीं होता