उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ruh par zulm Dha raha hun main

रूह पर ज़ुल्म ढा रहा हूँ मैं

روح پر ظلم ڈھا رہا ہوں میں

शायर: Baloch Mehfooz Khan15 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रूह पर ज़ुल्म ढा रहा हूँ मैं
और सब से छुपा रहा हूँ मैं

प्यास में ज़हर पी रहा हूँ मैं
भूक में ज़ख़्म खा रहा हूँ मैं

शा'इरी में सभी को उलझा कर
अस्ल मक़्सद छुपा रहा हूँ मैं

मैं यक़ीनन बहुत घिनौना हूँ
आप को सच बता रहा हूँ मैं

सब दिया है मुझे मिरे रब ने
शोर बेजा मचा रहा हूँ मैं

'उम्र सारी 'अमल से ख़ाली है
सिर्फ़ बातें बना रहा हूँ मैं

भौंकता हूँ जली-कटी बातें
आप का दिल दुखा रहा हूँ मैं

दूर हो कर तिरी मोहब्बत से
सिर्फ़ ख़ुद को जला रहा हूँ मैं

हर घड़ी सोच सोच कर दिल को
आग ही तो लगा रहा हूँ मैं

हैं बहुत सी बुराइयाँ मुझ में
आप को कम गिना रहा हूँ मैं

ख़ुद को इतना तबाह कर के भी
देख ख़ुशियाँ मना रहा हूँ मैं

शा'इरी में लहू छिड़क कर के
एक शो'ला बुझा रहा हूँ मैं

मैं भले ही तबाह हो जाऊँ
आप को तो बचा रहा हूँ मैं

बात मत मानना कभी मेरी
झूट ही बोलता रहा हूँ मैं

आज ख़ुद को बुरा भला कह कर
आइना ही दिखा रहा हूँ मैं