उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rut ki be-rang faza hai main hun

रुत की बे-रंग फ़ज़ा है मैं हूँ

رت کی بے رنگ فضا ہے میں ہوں

शायर: Vikas Sharma Raaz8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रुत की बे-रंग फ़ज़ा है मैं हूँ
बर्ग-रेज़ों की सदा है मैं हूँ

रात का एक बजा है मैं हूँ
घर में जो जाग रहा है मैं हूँ

ये जो है धूप-किरन ये तुम हो
ये दरीचा जो खुला है मैं हूँ

जो रग-ए-जाँ में है रौशन तुम हो
ताक़-ए-दिल में जो बुझा है मैं हूँ

ये जो किर्चें हैं मिरी ज़ात की हैं
मुझ में जो टूट गया है मैं हूँ

ये धनक देख रही हो जानाँ
इस में जो रंग हरा है मैं हूँ

ये जो तन्हाई है मेहमाँ है यहाँ
घर में हम दो हैं ख़ुदा है मैं हूँ

ज़िंदगी लौट रही है मुझ में
बा'द मुद्दत ये लगा है मैं हूँ